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    Sunday, January 8, 2017

    समय : क्या है समय ? -Time: What time?


                                                     समय : क्या है समय ?                                                                                                                                                                                                                                     अर्जुन सामरिया  :सभी लोगो को मेरा प्यार भरा नमस्कार। मेरी पिछली दोनों पोस्टो को अत्याधिक पसंद करने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार। आज की पोस्ट में आपको  जानकारी दूंगा की आज के दोर में विज्ञान ने अत्यधिक तरकी कर लि है वेज्ञानिको  ने समय के बारे में भी पता लगा लिया है की समय है क्या समय का निर्माण कैसे हुआ                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              
     



    समय क्या है ? समय का निर्माण कैसे होता है?

    भौतिक वैज्ञानिक तथा लेखक पाल डेवीस के अनुसार “समय” आइंस्टाइन की अधूरी क्रांति है। समय की प्रकृति से जुड़े अनेक अनसुलझे प्रश्न है।

    समय क्या है ?
    समय का निर्माण कैसे होता है ?
    गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से समय धीमा कैसे हो जाता है ?
    गति मे समय धीमा क्यों हो जाता है ?
    क्या समय एक आयाम है ?
    अरस्तु ने अनुमान लगाया था कि समय गति का प्रभाव हो सकता है लेकिन उन्होने यह भी कहा था कि गति धीमी या तेज हो सकती है लेकिन समय नहीं! अरस्तु के पास आइंस्टाइन के सापेक्षतावाद के सिद्धांत को जानने का कोई माध्यम नही था जिसके अनुसार समय की गति मे परिवर्तन संभव है। इसी तरह जब आइंस्टाइन साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत के विकास पर कार्य कर रहे थे और उन्होने क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा था कि द्रव्यमान के प्रभाव से अंतराल मे वक्रता आती है। लेकिन उस समय आइंस्टाइन  नही जानते थे कि ब्रह्माण्ड का विस्तार हो रहा है। ब्रह्माण्ड के विस्तार करने की खोज एडवीन हब्बल ने आइंस्टाइन द्वारा “साधारण सापेक्षतावाद” के सिद्धांत के प्रकाशित करने के 13 वर्षो बाद की थी। यदि आइंस्टाइन को विस्तार करते ब्रह्माण्ड का ज्ञान होता तो वे इसे अपने साधारण सापेक्षतावाद के सिद्धांत मे शामील करते। अवधारणात्मक रूप से विस्तार करते हुये ब्रह्माण्ड मे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव के फलस्वरूप धीमी गति से विस्तार करते हुये क्षेत्र के रूप मे अंतराल की वक्रता दर्शाना ज्यादा आसान है। हमारे ब्रह्माण्ड के सबसे नाटकीय पहलुंओ मे एक यह है कि उसका विस्तार हो रहा है और विस्तार करते अंतराल मे गति, बल तथा वक्र काल-अंतराल की उपस्थिति है।

    अगले कुछ अनुच्छेदों मे हम देखेंगे कि समय एक आकस्मिक अवधारणा है। ( time is an emergent concept.) गति तथा बलों की प्रक्रियाओं के फलस्वरूप समय की उत्पत्ति होती है, लेकिन जिसे हम समय मानते है, वह एक मरिचिका या भ्रम मात्र है। हमारी स्मृति भूतकाल का भ्रम उत्पन्न करती है। हमारी चेतना हमारे आसपास हो रही घटनाओं के फलस्वरूप वर्तमान का आभास उत्पन्न करती है। भविष्य हमारी भूतकाल की स्मृति आधारित मानसीक संरचना मात्र है। समय की अवधारणा हमारे मन द्वारा हमारे आसपास के सतत परिवर्तनशील विश्व मे को क्रमिक रूप से देखने से उत्पन्न होती है।

    जान एलीस मैकटैगार्ट तथा अन्य दार्शनिको के अनुसार समय व्यतित होना एक भ्रम मात्र है, केवल वर्तमान ही सत्य है। मैकटैगार्ट समय के विश्लेषण की A,B तथा C श्रृंखलांओ के लिये प्रसिद्ध है। इस समय विश्लेषण का साराशं नीचे प्रस्तुत है:

    समय के पूर्व और पश्चात के पहलू मूल रूप से समय के तीर(arrow of time) के रूप में ही है। किसी व्यक्ति का जन्म उसकी मृत्य से पूर्व ही होगा, भले ही दोनो घटनाये सुदूर अतीत का भाग हो। यह एक निश्चित संबध है; इस कारण मैकटैगार्ट कहते है कि कहीं कुछ समय से भी ज्यादा मौलिक होना चाहीये।
    समय के भूत, वर्तमान और भविष्य के पहलू सतत परिवर्तनशील है, भविष्य की घटनायें वर्तमान मे आती है तथा तपश्चात भूतकाल मे चली जाती है। यह पहलू समय की एक धारा का एहसास उत्पन्न कराता है। यह सतत परिवर्तनशील संबध समय की व्याख्या के लिए आवश्यक है। मैकटैगार्ट ने महसूस किया कि समय वास्तविक नही है क्योंकि भूत, वर्तमान और भविष्य के मध्य का अंतर(एक सतत परिवर्तनशील संबंध) समय के लिये पूर्व और पश्चात के स्थायी संबध की तुलना मे ज्यादा आवश्यक है।
    स्मृति के रूप मे समय

    मैकटैगार्ट का सबसे महत्वपूर्ण निरीक्षण यह था कि ऐतिहासिक घटनाओं तथा मानवरचित कहानीयों मे समय के गुण एक जैसे होते है। उदाहरण के लिये मानवरचित कहानीयों तथा भूतकाल की ऐतिहासीक घटनाओं की तुलना करने पर, दोनो मे पूर्व और पश्चात के साथ भूत, वर्तमान और भविष्य होता है, यह दर्शाता है कि भूतकाल घटनाओं की स्मृति मात्र है तथा लेखक की कल्पना के अतिरिक्त उसका अस्तित्व नही है। यदि हम कंप्युटर की स्मृति उपकरण जैसे सीडी या हार्डडीस्क मे संचित भूत, वर्तमान और भविष्य के बारे मे सोचें तो यह और स्पष्ट हो जाता है।

                                                                                         


    वर्तमान अत्यंत लघु क्षण होता है।

    “वर्तमान” यह समय की सबसे ज्यादा वास्तविक धारणा है, लेकिन हम जिसे वर्तमान के रूप मे देखते है वह पहले ही भूतकाल हो चुका होता है। वर्तमान क्षणभंगुर है, जो भी कुछ वर्तमान मे घटित हो रहा है वह समय रेखा पर एक अत्यंत लघु बिंदु पर सीमित है और उस पर सतत रूप से हमारे भूत और भविष्य का अतिक्रमण हो रहा है।

    वर्तमान किसी रिकार्डींग उपकरण का तीक्ष्ण लेज़र बिंदु या सुई है। जबकि भूत रिकॉर्डिंग माध्यम जैसे टेप या सीडी का उपयोग किया भाग है तथा भविष्य उसका रिक्त भाग।

    वर्तमान हमारे मस्तिष्क मे संचित स्मृति की मानसीक जागरुकता हो सकती है। कोई व्यक्ति किसी कार्यक्रम मे जाकर भी यदि सो जाये तो वह उस घटना को पूरी तरह से भूल सकता है। अब उस घटना का उसके भूतकाल मे अस्तित्व ही नही है। यदि हम किसी घटना के प्रति चेतन न हो तो वह हमारे भूतकाल की स्मृति का भाग नही बनती है।

    भूत और भविष्य समय के अंतराल है।

    वर्तमान के विपरीत हम भूत और भविष्य को घंटो, दिनो, महीनो और वर्षो मे मापे जा सकने वाले के अंतराल के रूप मे देखते है।
    भूतकाल की ऐतिहासिक घटनायें, भविष्य मे होने वाली शादी या कोई अन्य घटना सभी मापे जा सकने वाले अंतराल मे है, किसी रीकार्डींग वस्तु जैसे टेप, वीडीयो या किसी सीडी/डीवीडी के ट्रेक के जैसे।
    यह समानता दर्शाती है कि भूतकाल संचित स्मृति के जैसे है, जबकि भविष्य रिक्त स्मृति के जैसे। भविष्य हमारी स्मृति मसमय का मापन है

    किसी भी भौतिक राशी जैसे पैसा, द्रव्यमान, जमीन का टूकड़ा, गति, दूरी या प्रतिरोध का मापन हमारे द्वारा परिभाषित कुछ मानको द्वारा किया जाता है। द्रव्यमान के मापन के लिये हम किलोग्राम या पौंड जैसे मानको का उपयोग करते है। दूरी के मापन के लिये हम दूरी के मानक मीटर, यार्ड या फीट का प्रयोग करते है। इन्हे ध्यान मे रखते हुये ध्यान दिजीये कि हम गति का मापन कैसे करते है! हम गति के मापन के लिये समय का प्रयोग करते है अर्थात मीटर प्रति सेकंड या किलोमीटर प्रति घंटा। इससे एक संकेत मिलता है कि जब हम समय से व्यवहार करते है, वास्तविकता मे हम किसी गति के किसी मानक से व्यवहार कर रहे होते है।

    शायद हमने समय की संकल्पना वास्तविकता से ज्यादा जटिल बना दी है। समय का मापन मानव विकास की प्रारंभिक अवस्था से प्रारंभ हुआ है। इसके संकेत लगभग हर भाषा मे अभिवादन के शब्दो मे मिलते हैं। दिन मे समय सूर्य के आकाश मे स्थिती या अनुपस्थिति से संबधित था। इसमे प्रभात, सूर्योदय, सुबह,दोपहर, शाम, सूर्यास्त, रात, अर्धरात्री शामील है। इसके पश्चात वर्ष, माह, सप्ताह पृथ्वी की सूर्य की कक्षा मे वार्षिक परिक्रमा तथा मौसम मे परिवर्तन पर आधारित है। सेकंड और मिनिट जैसी इकाईयों का प्रयोग ज्यामिती मे कोणीय मापन पर आधारित है, जोकि वास्तविकता मे आकाश मे खगोलीय पिंडो की गति के कोणीय मापन से संबधित विधि है। जब से हमने घड़ीयों का प्रयोग प्रारंभ किया है हम समय मापन की इन प्राकृतिक विधियों से दूर हो गये है और समय की अवधारणा विकृत हो गयी है।समय को समझने की समस्या का सरल हल सूर्य के आकाश मे भ्रमण द्वारा समय के मापन विधि की ओर वापिस लौटने मे है। जब हम कार की गति का मापन करते है तब हम उसकी गति की तुलना घड़ी के कांटो की गति से करते है, अप्रत्यक्ष रूप से हम यह तुलना सूर्य की आकाशीय गति से करते है। हम गति का मापन समय के जैसे किसी अमूर्त राशी से नही कर रहे है, हम अज्ञात गति (कार) की तुलना ज्ञात गति (सूर्य की आकाशीय गति) से कर रहे होते है।                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      

    गति की इकाई के रूप मे समय

    समय विभिन्न तरह की गतियों की तुलना के लिये इकाई के रूप मे प्रयुक्त होता है, जैसे प्रकाशगति, हृदयगति, पृथ्वी की अपने अक्ष पर घूर्णन गति। लेकिन इन प्रक्रियाओं की तुलना समय के संदर्भ के बीना भी की जा सकती है। समय गति के मापन के लिए एक सामान्य इकाई हो सकता है, जिससे सारे विश्व मे एक इकाई से गति के मापन मे आसानी होगी। यह एक ऐसी इकाई होगी जिसका स्वतंत्र अस्तित्व नही है। गतिक प्रक्रिया का समय के रूप मे मापन की तुलना व्यापार मे करेंसी(मुद्रा) के प्रयोग से की जा सकती है। ध्यान दें कि यहाँ भी समय की उपस्थिति अर्थात गति की उपस्थिति की अवधारणा की पुष्टि हो रही है।

    वास्तविक रूप से समय क्या है ?

    समय एक आकस्मिक अवधारणा है। वह हमारे जीवन मे सतत परिवर्तित होने वाली वास्तविक घटना है। समय को समझने के लिये हमे इस सतत परिवर्तन को निर्मित करने वाली प्रक्रिया को समझना होगा जिससे समय के प्रवाह का भ्रम उत्पन्न होता है।

    समय गति से दृष्टिगोचर होता है और उसका मापन अन्य गति से तुलना के द्वारा होता है।, सूर्योदय, सूर्यास्त, रात और दिन, बदलते मौसम, खगोलीय पिंडो की गति यह सभी सतत परिवर्तन के प्रमाण हैं। उम्र बढ़ने की प्रक्रिया भी हमारी आण्विक गति तथा प्रक्रिया भी गति का प्रभाव है और समय का ही भाग है। इसके अतिरिक्त समय कि उपस्थिति का एक महत्वपूर्ण पहलू फोटान और परमाण्विक स्तर पर कणो की गति भी है।

    एक मानसीक प्रयोग                                           


    दो खगोलीय पिंडो की कल्पना किजीये, जिसमे एक पिंड दूसरे की परिक्रमा कर रहा है। अब मान लीजीये कि एक दूरस्थ निरीक्षण बिंदु से एक निश्चित समय पर हम पाते हैं कि उन दोनो पिंडो वाले क्षेत्र मे समय धीमा हो गया है। समय के धीमे होने से पिंडो की गति भी धीमी होना चाहीये। इस निरीक्षण मे गुरुत्वाकर्षण बल भी अनुपातीक रूप से कमजोर होना चाहीये अन्यथा दो पिंड एक दूसरे की ओर खिंचे जायेंगे। यदि हम समय की गति मे वृद्धि देखते है, तब गति मे भी वृद्धी होगी, साथ ही गुरुत्वाकर्षण मे भी वृद्धी होगी जो उन पिंडो को एक दूसरे से दूर जाने से रोकेगा। वहीं शून्य समय गति पर सब कुछ शून्य हो जायेगा अर्थात पिंडो की गति और गुरुत्वाकर्षण शून्य हो जायेगा।

    गुरुत्वाकर्षण बल की क्षमता मे वृद्धी या कमी केवल हमारे निरीक्षण बिंदु के निश्चित समय से संबधित है। परिक्रमा करते पिंडो के समय के परिपेक्ष मे ना तो उनकी गति मे परिवर्तन हुआ है ना उनके गुरुत्वाकर्षण मे। इस मानसीक प्रयोग को विद्युत-चुंबकीय बल द्वारा बांधे गये कणो पर भी कीया जा सकता है, तब हम कह सकते है कि समय बल और गति दोनो का समावेश करता है।

    समय की संभावित परिभाषा                                 


    ठहरा हुआ समय

    समय को एकाधिक परिपेक्ष्य मे परिभाषित किया जा सकता है।
    ज्ञान के परिपेक्ष्य से समय हमारे मस्तिष्क  द्वारा निर्मित एक आकस्मिक अवधारणा है। वर्तमान हमारी चेतना या हमारी स्मृति मे घटनाओ के लेखन की जानकारी है। भूतकाल स्मृति है जबकि भविष्य का अस्तित्व नही है।
    भौतिकशास्त्र के परिपेक्ष्य मे, समय ब्रह्मांड मे गति और बलो की उपस्थिती है।

    समय हर तरह की गति का समावेश करता है। कणो की स्पिन तथा फोटान की गति भी समय पर निर्भर है। गुरुत्वाकर्षण बल, विद्युत-चुंबकिय बल भी समय का भाग है, उसी तरह से खगोलीय पिंडो की गति, परमाणुओं की गति भी। हमने इस लेख मे समय की अवधारणा को आंशिक रूप से समझा है। 

    प्रयोगशाला में बनाया जा रहा है मानव मस्तिष्क! -The human brain is being created in the laboratory


            प्रयोगशाला में बनाया जा रहा है मानव मस्तिष्क!                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                              
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                                                                                                                                                                         अर्जुन सामरिया  :सभी लोगो को मेरा प्यार भरा नमस्कार। मेरी पिछली दोनों पोस्टो को अत्याधिक पसंद करने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार। आज की पोस्ट में आपको  जानकारी दूंगा की आज के दोर में विज्ञान ने अत्यधिक तरकी कर लि है और धीरे विज्ञान का शेत्र बढ़ता जा रहा है   हमारे बड़े बुज़ुर्ग हमेशा ये बात कहते हैं कि मानव चाहे जितनी प्रगति कर ले लेकिन वो ईश्वर नहीं बन सकता। यानि जो चीज़ें प्रकृति ने अपने हाथ में रखी हैं उनमें किसी तरह का परिवर्तन नहीं किया जा सकता। ना ही वैसी चीज़ें वो पैदा कर सकता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है मानव का जन्म। यानि दुनिया में ऐसी कोई ताक़त नहीं जो मानव को पैदा कर सके या मानव शरीर के किसी भी हिस्से को वो अलग से बना सके।

    www.blogger.com/blogger.g?blogID=1285905846723356516#editor/target=post;postID=3094229258010126582हालांकि आज विज्ञान ने इतनी तरक़्क़ी कर ली है कि वो टेस्ट ट्यूब बेबी पैदा कर सकता है। क्लोन की मदद से एक ही मानव जैसे कई मानव भी बना सकता है। आज तो प्रयोगशाला में ही मानव के शरीर   के अंग बनाए जा रहे हैं।                                                                                                                                       ऐसा ही एक प्रयोग किया जा रहा है कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की मोलिक्यूलर बायोलोजी प्रयोगशाला में। जहां मानव की चमड़ी से मानव का मस्तिष्क बनाने की कोशिश की जा रही है। यहां मस्तिष्क का विकास उसी तरह से किया जा रहा है जैसे मां के पेट में एक बच्चे का होता है।

    अंतर केवल इतना है कि मां के पेट में मस्तिष्क का विकास खून की आपूर्ती से होता है। मां जो पोषक तत्व लेती है वही बच्चे को मिलते हैं। वहीं, इस प्रयोगशाला में जिस मस्तिष्क को बनाया जा रहा है, उसे ज़रूरी चीज़ें दूसरी शक़्ल में मुहैया कराई जा रही हैं। इस बात का विशेष ध्यान जा रहा है कि परखनली में उपज रहे मस्तिष्क को इन्फेक्शन न हो जाए। इसीलिए जिस माहौल में विकसित होते नन्हे मस्तिष्क रखे जाते हैं, उस पर ख़ास निगरानी होती है। जिस चीज़ में इन नन्हे मस्तिष्कों को रखा जाता है, पहले उसे अल्कोहल से साफ़ किया जाता है, ताकि कोई इन्फेक्शन न हो।अगर आप प्रयोगशाला में तैयार किए जा रहे मस्तिष्क को देखेंगें तो हो सकता है ये आपको उतने आकर्षक ना लगें। क्योंकि अभी वो पूरी तरह से विकसित नहीं हुए हैं। आप देखेंगे कि हल्के पीले और गुलाबी रंग के लिक्विड में पानी के बुलबुले जैसे कोई चीज़ तैर रही है। लेकिन ये बिल्कुल ऐसे ही विकसित हो रहा है जैसे किसी भी मानव का मस्तिष्क मां के गर्भ में विकसित होता है।

    जिस तरह मानव के मस्तिष्क के अलग अलग हिस्से होते हैं, उसी तरह प्रयोगशाला में विकसित हो रहे इस मस्तिष्क के भी कई हिस्से हैं। जैसे इसमें जो सुरमई हिस्सा है वो न्यूरॉन्स से बना है। और जहां आपको थोड़े मोटे टिशू नज़र आंगे वहां उसकी एक छोटी सी दुम विकसित हो रही है। इसका सीधा ताल्लुक़ रीढ़ की हड्डी से है। दरअसल मानव के मस्तिष्क में ये वो हिस्सा होता है जहां भाषा को समझने की विशेषता होती है। और सोचने की प्रक्रिया मस्तिष्क के इसी हिस्से में होती है।

    दूसरा हिस्सा है हिप्पोकैंपस। ये मस्तिष्क का वो हिस्सा है जो स्मृति और भावनाओं को नियंत्रण करता है। ये सभी हिस्से प्रयोगशाला में विकसित हो रहे इस मस्तिष्क में भी हैं। पूरी तरह से तैयार होने पर ये बिल्कुल ऐसे ही लगेगा जैसे एक नौ महीने के बच्चे का मस्तिष्क लगता है।

    मानव मस्तिष्कों की ये खेती कैसे की जा रही है?प्रश्न ये है कि आख़िर मानव मस्तिष्कों की ये खेती कैसे की जा रही है? विशेषज्ञो का कहना है कि प्रयोगशाला में मस्तिष्क बनाना कोई इतना कठिन कार्य नहीं, जितना देखने, सुनने में लगता है।

    सबसे पहले उसके लिए कुछ कोशिकाओं की आवश्यकता है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी में इन मस्तिष्कों को तैयार करने वाली टीम की प्रमुख हैं मैडेलीन लैंकेस्टर।लैंकेस्टर का कहना है इस काम के लिए नाक, जिगर, पैर के नाखून की कोशिकाएं ली जा सकती हैं। हालांकि उनमें से स्टेम कोशिकाओं को अलग करना होगा। क्योंकि इन्हीं से मानव के बदन के बाक़ी अंग विकसित किए जा सकते हैं।
    आप प्रयोगशाला में परखनली में पल रहे मस्तिष्कों को देखेंगे तो आपको एक कोमा के साइज़ का सफ़ेद डॉट नज़र आएगा।

    ये बिल्कुल ऐसा ही है जैसा एक भ्रूण का मस्तिष्क होता है। आपने जिस स्टेम कोशिकाओं का इस्तेमाल मस्तिष्क विकसित करने में किया है। वो कुछ दिनों तक पोषक तत्व दिए जाने पर छोटी गेंदों जैसे दिखने लगते हैं। इन्हीं के बीच मस्तिष्क कोशिका या वो कोशिकाएं होती हैं जो आगे चलकर मस्तिष्क के तौर पर विकसित होंगी।

    अगला पड़ाव होगा कि बाक़ी कोशिकाओं को ख़त्म करके, सिर्फ़ मस्तिष्क बनाने वाली कोशिकाओं को बचाया जाए। इसके लिए वैज्ञानिक इस गेंद जैसी चीज़ को खाना-पीना देना बंद कर देते हैं। इससे ज़्यादातर कोशिकाएं मर जाती हैं। मगर जिन कोशिकाओं से मस्तिष्क बनना होता है, उनमें संकट झेलने की शक्ति अधिक होती है। इसलिए वो बच जाती हैं। फिर इन्हें अलग करके दूसरी डिश में रखा जाता हैप्रोफेसर मैडलीन लैंकेस्टर कहती हैं इन शिशु मस्तिष्क को विकसित करने वाली टीम एक फ़िक्रमंद माता पिता की तरह ही इनकी देखभाल करती है। जब एक ख़ास स्तर तक ये ब्रेन कोशिकाओं विकसित हो जाते हैं तो उन्हें एक जेली जैसे द्रव में डाल दिया जाता है। जो इस शिशु मस्तिष्क के चारों तरफ़ सुरक्षा घेरा बना लेती है। इसके बाद इस मस्तिष्क को ज़रूरी पोषक चीज़ें दी जाती हैं। क़रीब तीन महीने में ये शिशु मस्तिष्क तैयार हो जाते हैं। तीन महीनों में ये मस्तिष्क करीब चार मिलीमीटर को हो जाता है और इसमें क़रीब बीस लाख तंत्रिकाएं होती हैं। आम तौर पर एक चूहे के मस्तिष्क में इतने ही न्यूरॉन होते हैं।
                                                                                                                                                                                                                                                                                 
      वो कहती हैं कि ऐसे शिशु मस्तिष्क से हम आम मानव के मस्तिष्क जैसा काम नहीं ले सकते। क्योंकि ये सोचने की क्षमता नहीं रखता है। हालांकि इससे हमें ये समझने में मदद मिलती है हीं है। बल्कि इस खोज के ज़रिए वो मानव और बाक़ी जानवरों के मस्तिष्क के काम की तुलना करना चाहती हैं। असल में एक चिंपैंज़ी और मानव के मस्तिष्क में जो जेनेटिक फ़र्क़ है वो बेहद कम है। फिर भी चिंपैंज़ी और मानव के विकास में एक बहुत बड़ा फ़ासला हो गया है।इसे समझने के लिए मैडलीन और उनकी टीम ने मानव और चिंपैंज़ी के जीन से नया मस्तिष्क विकसित किया। इस अनुभव में पाया गया कि चिंपैंज़ी के जीन वाले हिस्से में जो तंत्रिकाएं विकसित हुईं वो मानव जीन से बनी कोशिकाओं के  वैसे, प्रयोगशाला में बनाए जा रहे इस कृत्रिम मस्तिष्क से हमें ऑटिज़्म और शिज़ोफ्रेनिया जैसी बीमारियों से निपटने में मदद मिल सकती है। पिछले साल ही वैज्ञानिक ये पता लगाने में कामयाब रहे कि ऑटिज़्म की असल वजह मस्तिष्क में दो तरह के न्यूरोन में ठीक तालमेल नहीं होना है। इस रिसर्च के बाद ही वैज्ञानिक ये भी जान पाए कि जब भ्रूण का मस्तिष्क विकसित हो रहा हो तभी ये बीमारी पकड़ी जा सकती है।लैंकेस्टर कहती हैं प्रयोगशाला में मस्तिष्क विकसित करने के बाद मानव के मस्तिष्क को समझने की वैज्ञानिकों की समझ बढ़ी है। और इस दिशा में तेज़ी से काम आगे बढ़ रहा है।
                                                                                                                                                                               

    वैज्ञानिकों का मक़सद अब प्रयोगशाला में बड़े आकार का मस्तिष्क विकसित करना है। जिससे इन मस्तिष्कों को प्रयोगशाला में उसी तरह काट-पीटकर समझा जा सके, जैसे वैज्ञानिक चूहों के मस्तिष्क के साथ करते हैं।

    Saturday, January 7, 2017

    जानिए वायरलेस मेडिसिन' से इलाज की कल्पना -Know Wireless Medicine imagine the treatment

                                जानिए वायरलेस मेडिसिन' से इलाज                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                 अर्जुन सामरिया  :सभी लोगो को मेरा प्यार भरा नमस्कार। मेरी पिछली दोनों पोस्टो को अत्याधिक पसंद करने के लिए आप सभी का हार्दिक आभार। आज की पोस्ट में आपको  जानकारी दूंगा  की  वायरलेस मेडिसिन' से इलाज से इलाज की कल्पना के बारे में  भविष्य में डॉक्टरी इलाज 'वायरलेस मेडिसिन' से होगा। माइक्रो इलेक्ट्रॉनिक्स में हो रही प्रगति के बाद डॉक्टर अब ऐसे दिन की कल्पना करने लगे हैं, जब वे वाई-फाई, ब्लू टूथ और दूसरी वायरलेस टेक्नॉलजी का इस्तेमाल करने वाले मेडिकल इम्प्लांट्स के जरिये अपने मरीजों पर नजर रखेंगे और उनका इलाज करेंगे। वैज्ञानिकों ने ऐसे सूक्ष्म वायरलेस डिवाइस भी तैयार कर लिए हैं, जो रक्त में तैर कर डॉक्टरों का काम आसान कर देंगे। वैज्ञानिकों ने रेत के कण से भी छोटी एक ऐसी 'खाने योग्य माइक्रोचिप' भी विकसित की है, जो मरीज द्वारा ली जाने वाली दवाओं का पूरा ब्यौरा रखती है और मरीज के शरीर से ही वायरलेस ट्रांसमिशन के जरिये सारी जानकारी मरीज के रिश्तेदार या स्वास्थ्यकर्मी के मोबाइल फोन पर भेज देती है। ये उपलब्धियां चिकित्सा के क्षेत्र में हो रही व्यापक तकनीकी क्रांति का हिस्सा है, जिसमें वायरलेस उपकरणों के सूक्ष्मीकरण का भरपूर फायदा उठाया जा रहा है। इन सूक्ष्म उपकरणों को मरीजों के शरीर के भीतर प्रत्यारोपित किए जा सकने की क्षमता ने एक नई किस्म की टेलिमेडिसिन अथवा 'सुदूर चिकित्सा' का आधार तैयार कर दिया है।

    एक मेडिकल चिप के जरिए मरीज के शरीर के अंदर दवाएं डिलिवर करने का सफल प्रयोग ओस्टियोपोरोसिस के रोगियों पर किया गया। इस चिप का आकार एक पेसमेकर जितना है। इसे सर्जरी के जरिये मरीज की स्किन के नीचे फिट किया जाता है। क्लिनिकल परीक्षण के दौरान इस चिप में ओस्टियोपोरोसिस की एक खास दवा की 20 खुराकों से भरी गई। यह दवा सामान्य तौर पर हर रोज इंजेक्शन के जरिये देनी पड़ती है। डेनमार्क में 65 और 70 साल के बीच की सात महिलाओं ने क्लिनिकल परीक्षण में भाग लिया। उनके शरीर में आधे घंटे की सर्जरी के जरिये माइक्रोचिप प्रत्यारोपित की गई। यह माइक्रोचिप 12 महीने तक उनके शरीर में रही। इस दौरान उनके स्वास्थ्य पर पूरी निगरानी रखी गई। माइक्रो चिप ने अपेक्षा के अनुरूप काम किया और महिलाओं में बोन फार्मेशन की प्रक्रिया में काफी सुधार दिखाई दिया।

    एक बाहरी वायरलेस डिवाइस से इस चिप को निर्देश देकर यह बताया जाता है कि मरीज को दवा की सही खुराक कब-कब देनी है। इससे यह सुनिश्चित हो जाता है कि मरीज को दिन में सही समय पर सही खुराक मिल रही है। इस प्रयोग से जुड़े रिसर्चरों का कहना है कि इस इम्प्लांट से मरीज को दवा लेने का समय याद रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी और उसे कष्टदायक इंजेक्शनों से भी निजात मिल जाएगी।

    मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी के प्रफेसर राबर्ट लेंगर के अनुसार नई चिप एक फार्मेसी की तरह काम करेगी। आप रिमोट से दवाओं की डिलीवरी को नियंत्रित कर सकते हैं। इस विधि से एक साथ कई दवाएं मरीज के शरीर में पहुंचाई जा सकती हैं। ये दवाएं माइक्रो चिप के छिद्रों में रखी जाएंगी और इन्हें सोने की अत्यंत सूक्ष्म परत से ढका जाएगा। ऐसी दवाएं वर्षों तक सुरक्षित रह सकती हैं। इंजेक्शनों की तुलना में इस विधि से दी जाने वाली खुराक में किसी किस्म की भिन्नता की गुंजाइश भी नहीं रहेगी। अत: यह ज्यादा सुरक्षित और ज्यादा कारगर होगी। इस टेक्नॉलजी से उन मरीजों को बहुत फायदा होगा, जिन्हें दर्द निवारण के लिए नियमित रूप से अस्पताल जाना पड़ता है या हर रोज इंजेक्शन लगवाने पड़ते हैं। अनेक दवाओं के मामले में डॉक्टरी निर्देशों का कड़ाई से पालन करना जरूरी होता है, लेकिन जब मरीजों को खुद इंजेक्शन लेना पड़ता है तो कभी-कभी निर्देशों पर अमल करने में कठिनाई होती है। माइक्रो चिप से दी जाने वाली दवाएं ऐसी स्थिति नहीं उत्पन्न होने देंगी। भविष्य में इस टेक्नॉलजी के प्रयोग से दवाओं की डिलीवरी पूरी तरह से स्वचालित हो जाएगी। 'इंटेलिजेंट मेडिसिन' के युग में डॉक्टर कंप्यूटर या फोन के जरिये अपने मरीज की चिकित्सा पर निगरानी रख सकेंगे और उसमें आवश्यक फेरबदल कर सकेंगे।

    पिछले कई दशकों से वैज्ञानिक ऐसे सूक्ष्म उपकरण का सपना देख रहे हैं, जो शरीर के अंदर रक्त में तैर सकें। स्टेनफर्ड यूनिवर्सिटी की इलेक्ट्रिकल इंजिनियर एडा पून ने एक ऐसे ही सूक्ष्म मेडिकल डिवाइस का प्रदर्शन किया है, जो रक्त की धारा में अपने आप आगे बढ़ सकता है। इन उपकरणों को मनुष्य के शरीर में प्रत्यारोपित या इंजेक्ट किया जा सकता है और विद्युत चुंबकीय रेडियो तरंगों की ऊर्जा से संचालित किया जा सकता है। इनके लिए न तो बैटरी की जरूरत है और न ही तारों की। पून का दावा है कि इन उपकरणों से मेडिकल टेक्नॉलजी का स्वरूप ही बदल जाएगा। ये उपकरण रोग निदान के अलावा सर्जरी में भी काम आएंगे। हृदय की जांच के उपकरण, पेसमेकर, कानों के इम्प्लांट और ड्रग पंप जैसे डिवाइस शरीर के अंदर ही रहेंगे, जबकि दूसरे वायरलेस उपकरण रक्तधारा में तैर कर दवाओं की डिलीवरी करेंगे, खून के थक्के दूर करेंगे या रक्त धमनियों में जमा परत को हटाएंगे।

    माइक्रो चिप को विकसित करने के पीछे असली मकसद ऐसी 'इंटेलिजेंट मेडिसिन' विकसित करना है, जो मरीज को दिन में सही वक्त पर सही दवा लेने में मदद देगी। इससे मरीज के रिश्तेदार को भी यह जानकारी रहेगी कि मरीज ने सभी दवाएं ठीक से ली हैं या नहीं। मरीजों को कई तरह की दवाएं लेनी पड़ती हैं और कभी-कभी वे कुछ दवाएं लेना भूल जाते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक दुनिया में आधे मरीज अपनी दवाएं सही ढंग से नहीं लेते। इससे उन्हें इलाज का पूरा फायदा नहीं मिल पाता। कुछ मरीजों को नुकसानदायक साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ता है। डिजिटल दवाओं से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि मरीजों को दी जाने वाली दवाएं शरीर में कारगर तरीके से काम करें। गंभीर रूप से बीमार व्यक्तियों को दी जाने वाली जरूरी दवाओं को भी डिजिटल करने की योजना है। यह चिप खाद्य वस्तुओं में पाए जाने वाले तत्वों से बनाई गई है।

    न्यूयॉर्क प्रेसबाइटेरियन हॉस्पिटल और कोलंबिया यूनिवर्सिटी मेडिकल सेंटर के डॉक्टर सर्जरी के लिए नन्हे सर्पाकार रोबॉट अथवा स्नेकबॉट का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन रोबॉट्स में कैमरे, फोरसेप और दूसर

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